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श्राद्ध का महत्त्व एवं लाभ


पितृकार्य देवकार्य से श्रेष्ठ कैसे है ?’, ‘श्राद्ध - यह धर्म, अर्थ व काम की प्राप्ति कैसे करवाता है ?’, ‘श्राद्ध से पूर्वजों के कष्टों से हमारा रक्षण कैसे होता है ?’ इत्यादि सूत्रों का अध्यात्मशास्त्रीय विवेचन इस लेख में देखेंगे । इन सभी सूत्रों से हिन्दू धर्म का महत्त्व हमारे ध्यान में आएगा ।  

1. श्राद्ध के कारण पितृदोष के कष्ट से रक्षा कैसे होती है ?
‘श्राद्ध द्वारा उत्पन्न ऊर्जा मृत व्यक्ति की लिंगदेह में समाई हुई त्रिगुणों की ऊर्जा से साम्य दर्शाती है; इसलिए अल्पावधि में श्राद्ध से उत्पन्न ऊर्जा के बल पर लिंगदेह मर्त्यलोक पार करती है । (मर्त्यलोक भूलोक एवं भुवर्लोक के मध्य स्थित है ।) एक बार जो लिंगदेह मर्त्यलोक पार कर लेती है, वह पुनः लौटकर पृथ्वी पर रहनेवाले सामान्य व्यक्ति को कष्ट देने के लिए पृथ्वी की वातावरण-कक्षा में नहीं आ सकती । इसीलिए श्राद्ध का अत्यधिक महत्त्व है; अन्यथा विषय-वासनाओं में फंसी लिंगदेह, व्यक्ति की साधना में बाधाएं उत्पन्न कर उसे साधना से परावृत्त (विमुख) कर सकती हैं ।’ - (सद्गुरु) श्रीमती अंजली गाडगीळ, सनातन संस्था

2. पद्मपुराण में ऐसा क्यों कहा है कि पितृकार्य देवकार्य से श्रेष्ठ है ?
अ. साधना न करनेवाला कोई व्यक्ति यदि पितरों के लिए कोई कार्य करे, तो उस पर पितरों की कृपा होती है तथा उसका जीवन सुखी होता है । तदुपरांत वह व्यक्ति साधना की ओर प्रवृत्त होकर देवकार्य भली-भांति कर सकता है । अतएव देवकार्य की अपेक्षा पितरों से संबंधित कार्य अधिक महत्त्वपूर्ण है ।
-कु. मधुरा भोसले, सनातन संस्था 

3. पितृऋण चुकानेवालों को श्राद्ध विधि के कारण देवऋण व ऋषिऋण चुकाना सुलभ होना
ऋषि देवताओं की तुलना में शीघ्रकोपी होत हैं, वे शाप देकर जीव को बंधन में डाल सकते हैं; परंतु पितृऋण कर्मवाचक होने के कारण उसे चुकाना अत्यंत सरल व सहज है । श्राद्धविधि कर्म से यह संभव होता है; अत: प्रत्येक व्यक्ति, उचित पद्धति से अपने ऋणों से मुक्त हो सकें इसके लिए ऋषि व देवऋणों को जोडनेवाली पितृऋणरूपी कडी का आश्रय लेकर उन्हें विधि द्वारा संतुष्ट कर मोक्ष गति प्राप्त कराने का प्रयत्न करना चाहिए । श्राद्धविधि करने से पितरों की सहायता से शनै-शनै देव एवं ऋषियों तक पहुंच कर वसु, रूद्र व आदित्य (वसु का अर्थ है इच्छा, रूद्र अर्थात लय व आदित्य अर्थात तेज, जिसका अर्थ है क्रिया), इन तीनों के संयोग से क्रमश: पिता, पितामह व प्रपितामह का उद्धार करना संभव होता है तथा देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करना भी संभव होता है ।

4. आपस के बंधनों को तोडकर जीवनमुक्त होना
श्राद्ध संज्ञा पूर्णरूप से माया व ब्रह्म के ऋणानुबंध से जुडी हुई है । जब ऋणानुबंध रूपात्मक लेन-देन के ये सूत्र समाप्त होकर जीव मुक्त होता है, उसी समय वह गति प्राप्त कर मोक्षमार्ग पर अग्रसर होता है । पितरऋणरूप माया का ध्येय भी मोक्षप्राप्ति करना होता है, इसलिए श्राद्धविधिकर्म से विष्णुगणों की साक्ष से आपस के बंध तोडकर जीवनमुक्त हो सकतेेे हैं । 

5. धर्म, अर्थ एवं काम की प्राप्ति श्राद्ध कैसे करवाता है ?
अध्यात्म में धर्म प्रत्यक्ष कर्तव्यपालन का, अर्थ कर्तव्य से प्राप्त समाधान पूर्ति का, जबकि काम कर्तव्यभावना से निर्मित आसक्ति के निर्दलन का (नाश का) प्रतीक है । श्राद्ध करते समय जो पितरों का दायित्व लेकर पितृऋण चुकाता है, वह एक प्रकार से पितरों की लिंगदेहों को गति देने के लिए प्रत्यक्ष कर्तव्यस्वरूप धर्मपालन ही करता है । इसी से उसमें सेवाभाव निर्मित होकर उसे अध्यात्म के एक-एक अर्थ की अर्थात समाधान की प्राप्ति होती है । इस प्रक्रिया में एक प्रकार से धर्म, अर्थ एवं काम साध्य होता जाता है । अतः इससे ज्ञात होता है कि हिन्दू धर्म में बताई श्राद्ध जैसी अशुद्ध विधि भी शुद्ध भाव से की जाए तो उससे भी धर्म, अर्थ एवं काम की प्राप्ति संभव है । 

6. श्राद्ध करने से एक सौ एक कुलों को गति प्राप्त होती है, इसका क्या अर्थ है ?
श्राद्ध करने से एक सौ एक कुलों को गति प्राप्त होने का अर्थ है, मृत जीव के साथ लेन-देन युक्त क्रिया के माध्यम से बंधे अन्य सजीवों को भी गति प्राप्त होना । जीवनकाल में प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से लेन-देन युक्त रूप में संपर्क में आए अन्य जीव इस अर्थ से कुल शब्द का उपयोग किया गया है, पीढी के अर्थ में नहीं । श्राद्धादि कर्म उस जीव के साथ-साथ अनेक कारणों से संपर्क में आए लगभग सौ जीवों का लेन-देन युक्त संपर्क चुकाने में सहायक होता है । अतएव वे जीव भी इस लेन-देन कर्म से मुक्त होते हैं । भले ही अल्प मात्रा में क्यों न हो, थोडी गति धारण करते हैं । इस अर्थ से ऐसा कहा गया है कि श्राद्ध करने से एक सौ एक कुलों को गति प्राप्त होती है अर्थात मृत व्यक्ति से संबंधित लेन-देन युक्त क्रिया से बंधे अन्य जीवों को भी गति प्राप्त होती है । 

7. श्राद्धकर्म की विधि पितरों के लिए है, फिर भी वह किसी विशिष्ट तिथि पर करने से कर्ता को विशिष्ट फलप्राप्ति होती है ।
प्रत्येक कृत्य अपने कार्यकारणभाव के साथ जन्म लेता है । प्रत्येक कृत्य की प्रभावकारिता, उसके कार्यमान कर्ता, कार्य करने की उचित घटिका (समय) एवं कार्यस्थल आदि पर निर्भर करती है । इन सभी की पूरकता पर कार्य की फलोत्पत्ति अर्थात परिपूर्णता निश्‍चित होती है तथा कर्ता को विशिष्ट फल प्राप्त होता है । प्रत्येक कृत्य को उस विशिष्ट तिथि अथवा विशिष्ट मुहूर्त में करना महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि उस दिन उन घटनात्मक कर्मों के कालचक्र एवं उनका प्रत्यक्ष घटनाक्रम, तथा उससे उत्पन्न परिणाम इन सभी के स्पंदन एक समान अर्थात एक-दूसरे के लिए पूरक होते हैं । 
- (सद्गुरु) श्रीमती अंजली गाडगीळ, सनातन संस्था

संदर्भ : सनातन संस्था का ग्रंथ श्राद्ध (भाग 2) श्राद्धविधि का अध्यात्मशास्त्रीय आधार

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