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समाज को नई दिशा देते युवा संत स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती

देश में गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा एवं अन्याय के खिलाफ आवाजे काफी समय से उठती आई है। लेकिन उनके लिए काम करने व इनसे बाहर निकालने की ललक है स्वामी जी में। यही नहीं वे पर्यावरण, कम उम्र में वैश्यावृत्ति में धकेली गई बालिकाओं तथा देश में अन्य समस्याओं को लेकर काफी समय से संघर्ष कर रहे हैं। वे कम उम्र में ही अखिल भारतीय संत समिति के उपाध्यक्ष भी है। आईये जानते हैं स्वामी जी के प्रयासों को।
बहुत छोटी उम्र से सेवा कार्य में लगे स्वामीजी गरीब, पीडि़त और शोषित वर्ग के लिए काम कर रहे है। स्वामीजी की इच्छा यह थी कि वे कुछ अलग  करे। बस वे लग गए बिना किसी प्रचार प्रसार के इस पुनित कार्य में। स्वामीजी ने भारत में बढ़ रही समस्याओं का अध्ययन किया और फिर लग गए उनके निपटान में। स्वामीजी ने पूरे देश में अपने शिष्यों के माध्यम से सबसे पहले गरीब, शोषित वर्ग के उत्थान के लिए काम शुरू किया। प्रमुख रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटका, तमिलनाडु और अन्य कई राज्यों में अपने सेवा प्रकल्पों को मूर्त रूप दिया। स्वामीजी अपने इन प्रयासों से समाज के अन्य लोगों को भी जोड़ते हैं ताकि उनके मन में भी सेवा का भाव उत्पन्न हो।
स्वामी जी ने चर्चा में बताया कि बेटी को देवी मानने वाले भारत देश में आज बलात्कार जैसे शब्द सुनने में आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन सबके पीछे देश में फैल रहे अश£ीलता, फिल्मों में परोसा जा रहा नंगापन और इंटरनेट के दुरूपयोग है। वे देश के युवाओं को इस बात से परिचित भी करवाते हैं कि जिस देश में देवी समझकर बेटी का पूजन किया जाता है वहीं सबसे ज्यादा बलात्कार जैसे घिनौने काम हो रहे हैं। उनका कहना था कि यदि घर में बच्चों को अच्छे संस्कार दिये जाए तो देश फिर से बेटियों की इज्जत करना सीख सकता है।
हर क्षेत्र में सक्रिय स्वामीजी
स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती जी के जीवन का ध्येय केवल मानव सेवा ही है। इसीलिए गरीब तबके के लिए हमेशा तत्पर रहते है। वे यह प्रयास करते हैं कि कोई बेटी गलत लोगों की वजह से वैश्यावृत्ति के धंधे में पहुंच गई है तो उसको पुन: समाज में सम्मान व स्थान मिले। इसके लिए उनका कार्य निरंतर चलता रहता है। वे अब तक सैकड़ों बालिकाओं का पुन: समाज की मुख्य धारा में लाने में सफल भी हुए हंै।
हर वर्ग का दुख समझते हंैं
स्वामीजी गरीब के दु:ख को अपना दु:ख समझते हैं। वे कभी किसी को दु:खी देखते हैं तो उसको गले लगाकर ढांढस बंधाते हैं और उसके दु:ख के निवारण के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। स्वामीजी पशु क्रुरता के भी खासे खिलाफ है। उनका मानना है कि प्रकृति में केवल इंसानों का ही नहीं अपितु पशुओं का भी अपना अलग स्थान है। पशु क्रूरता के खिलाफ स्वामीीजी ने बड़ी मुहिम छेड़ रखी है।

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