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गिरीजा और मीना बनी पशुपतिनाथ मंदिर की पहरेदार

मंदसौर प्रदेश में महिला सशक्तिकरण के सकारात्मक प्रभाव अब समाज में दिखने लगे हैं। बाल-विवाह के खिलाफ बेटियाँ सजग हो गई हैं। प्रशासनिक सहयोग के फलस्वरूप बेटियों के हौसलों को नई ऊर्जा मिली है। मंदसौर जिले कि गलियाखेड़ी निवासी गिरिजा बैरागी और निम्बोद की ललिता मीना ने अपने बाल विवाह को शून्य घोषित करवाया और स्वावलंबी बनने की ठानी। जहाँ चाह-वहाँ राह की लोकोक्ति को चरितार्थ करते हुए दोनों बेटी अब मंदसौर के सुप्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर में सुरक्षा गार्ड के रूप मे तैनात हैं।  गिरिजा जब 14 वर्ष की थी, तभी परिवार वालों ने उनका विवाह करवा दिया। गिरिजा के ससुराल वाले चाहते थे कि वह घर और खेती देखे, लेकिन वह पढ़ना चाहती थी। स्कूल में गिरिजा को जानकारी मिली की बाल विवाह को शून्य घोषित करवाया जा सकता है। उसने जिला महिला सशक्तिकरण अधिकारी से संपर्क किया और अपना बाल विवाह शून्य करवाया। महिला एवं बाल विकास विभाग ने गिरिजा को सुरक्षा गार्ड की ट्रेनिंग दिलवाई। आज गिरिजा पशुपतिनाथ मंदिर में सुरक्षा गार्ड है और स्नातक पाठ्यक्रम की पढ़ाई भी कर रही है। निम्बोद निवासी ललिता मीना का साफ मानना है कि हौसला हो, तो सब कुछ संभव है। मीना के पिता की मृत्यु के बाद रिश्तेदारों ने उसका विवाह मात्र 13 वर्ष की उम्र में ही करवा दिया था। विवाह के बाद उसे पता लगा कि उसका पति पूर्व से ही विवाहित था। मीना ने ससुराल से वापस अपनी माँ के घर आकर आगे की पढ़ाई के लिये जिद की। बड़ी मुश्किल से परिवार वाले 10वीं कक्षा तक की पढ़ाई के लिये राजी हुए। उसे स्कूल से बाल-विवाह के बंधन मुक्त होने की जानकारी मिली। मीना ने हिम्मत जुटाकर बाल संरक्षण अधिकारी से अपना विवाह शून्य घोषित करवाया। आज मीना भी पशुपतिनाथ मंदिर में सुरक्षा गार्ड के पद पर तैनात है।

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