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शिवराज के मंत्री पारस जैन सहित दर्जनभर मंत्रियों की सीट खतरें में

करीब 10 दर्जन नए चेहरों पर करना होगा भाजपा को भरोसा, मप्र की 230 विधानसभा के सर्वे में उड़ी भाजपा संगठन और ‘शिव’ सरकार की नींद भोपाल। हाल ही में दिल्ली की एक संस्था ने भाजपा संगठन के लिए मध्य प्रदेश के 230 विधानसभा क्षेत्रों में सर्वे कराया गया है। सर्वे रिपोर्ट पढक़र संगठन की नींद उड़ गई है। नींद उडऩे का कारण है सर्वे में जो निष्कर्ष निकलकर आया है। करीब 50 प्रतिशत से ज्यादा विधायकों के लिए जो हवा चल रही है वह विपरित है। यदि प्रत्याशी नहीं बदले गए तो भारतीय जनता पार्टी को इन सीटों से हार का सामना करना पड़ सकता है। अगर भाजपा अब प्रत्याशी बदलने के बाद भी यह डर सता रहा है कि असंतुष्ट नेता पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर सकते हैं   उज्जैन आज तक न्यूज। आगामी कुछ माह बाद ही मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव होना है। सत्ताधारी पार्टी इस बार भी 200 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा कर रही है। सूत्रों की माने तो अंदरूनी रिपोर्ट और हाल ही में दिल्ली की अपेक्स नामक संस्था द्वारा 230 सीटों के सर्वे में शिवराज सरकार पर जिस तरह के सवाल उठाए हैं, उसने मप्र सरकार से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तक की नींद उड़ा दी है। हालात यह है कि विधानसभा चुनावों को लेकर कराए गए इस सर्वे में शिवराज काबीना के 17 मंत्रियों और मौजूदा 166 विधायकों में से 80 विधायक पर खतरें की तलवार लटक रही है। इन मंत्रियों और विधायकों पर यदि पार्टी फिर से टिकिट देती है तो परिणाम विपरित आ सकते हैंं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ 86 विधायक ही ऐसे हैं जो अपने क्षेत्र में फिर से जीत सकते हैं। इसलिए 200 पार का आंकड़ा छूने के लिए भाजपा संगठन को 120 नए दावेदारों पर भरोसा करना होगा।  हालांकि, नए उम्मीदवारों पर दांव लगाना भाजपा के लिए दिक्कत की वजह बन सकता है। अगर पार्टी नए उम्मीदवारों पर दांव खेलती है, तो उसे पुराने विधायकों का असंतोष झेलना पड़ सकता है, और नहीं खेलती है तो चौथी बार प्रदेश में सरकार बनाना तो मुश्किल हो जाएगा। अब शिवराज सरकार और भाजपा के रणनीतिकार आत्म-चिंतन और मंथन में जुटे हैं। मगर यह तय है कि चौथी बार भाजपा सरकार का दावा कम से कम मध्यप्रदेश में तो आसान नहीं दिख रहा है।
 सर्वे में कांग्रेस आगे-
सूत्रों के मुताबिक हाल ही में कुछ न्यूज चैनल और संस्थाओं द्वारा प्रदेश की सभी 230 सीटों पर ओपिनियन पोल और सर्वे किए गए। इनमें सभी में कांग्रेस को आगे बताया जा रहा है। भाजपा ने इसे गंभीरता से तो लिया, लेकिन पार्टी के नेता अभी मुगालते में हैं। इन पार्टी नेताओं का मानना है कि ये सभी सर्वे आज के हालात में किए गए हैं लेकिन चुनाव के दौरान हालात बदल जाएंगे। उनका मानना है कि इनमें भी भाजपा को 100 से ज्यादा सीटें मिल रही हैं। इसका सीधा-सा मतलब है कि भाजपा जब कमजोर चेहरों को बदलकर चुनाव में उतारेगी तो उसे सरकार बनाने से कोई रोक नहीं सकता है।

 विंध्य, बुंदेलखंड में हालत खराब-
सर्वे में विंध्य और बुंदेलखंड में भाजपा के मौजूदा विधायकों में से 70 फीसदी की स्थिति अच्छी नहीं बताई गई है। इसके पीछे इस क्षेत्र में नेताओं का आपसी टकराव भी है। इसके अलावा कुछ विधायकों के क्षेत्र में पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस का प्रभाव बढने की सामने आई है है। ग्वालियर-चंबल में भी साठ फीसदी विधायकों को डेंजर जोन में बताए जा रहे हैं। मालवा के इंदौर और आसपास के जिलों में भाजपा की स्थिति मजबूत बताई गई है। परंतु उज्जैन जिले में सात में से पांच सीटें कमजोर बताई जा रहा है। महाकोशल में भी अधिकांश सीटों पर भाजपा पहले जैसी स्थिति में है। किसान आंदोलन के बाद से मंदसौर और नीमच, झाबुआ और अलीराजपुर जैसे जिलों में भी भाजपा के विधायकों की हालत पतली है। बताते हैं इस क्षेत्र में इस बार भाजपा की सीटें कम हो सकती हैं।

 नहीं आते प्रभारी जिलों के मंत्री-
रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि ज्यादातर मंत्री पूरा प्रदेश तो दूर की बात हैं, अपने प्रभार के जिलो में दौरा करने से कतराते हैं। इससे अधिकांश मंत्रियों के प्रभार वाले जिलों में भाजपा की स्थिति कमजोर हो रही है। हालांकि संघ और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस लापरवाही को लेकर मंत्रियों को कई बार आगाह कर चुके हैं। इसके बाद भी मंत्री अपने प्रभार के जिलों में जा नहीं रहे हैं। जबकि मुख्यमंत्री ने आधा दर्जन से ज्यादा मंत्रियों को प्रभार का जिला भी पसंदीदा दिया है। लेकिन मंत्री हैं कि संघ और सीएम के निर्देशों को हवा में उड़ा रहे हैं।

गठबंधन बड़ा सकता है मुसीबत-
भाजपा का राष्ट्रीय संगठन प्रदेश में कांग्रेस बसपा के संभावित गठबंधन को लेकर भी चिंतित है। अगर दोनों दल मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो यह भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। दरअसल, 14वीं विस के दौरान हुई वोटिंग में सबसे अधिक भाजपा को 44.87 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं। कांगे्रस 36.37 प्रतिशत मत प्राप्त कर दूसरे स्थान पर रही थी। बसपा को 6.29 प्रतिशत वोट मिले थे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह से अगर कांगे्रस और बसपा के वोट मिल जाएं तो भाजपा को सत्ता से वंचित होना पड़ सकता है। क्योंकि कांग्रेस और बसपा दोनों लहर में इतने वोट लाए थे तो अब हवा विपरित चल रही है।
 एंटी-इनकम्बेंसी का असर-
सर्वे में यह बात सामने आई है कि जो भाजपा विधायक क्षेत्र में समय नहीं दे पाए या लोगों के सुख-दुख से दूर रहे, उनकी हालत पतली है और वे चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं हैं। जब पार्टी ऐसे विधानसभा क्षेत्रों में नए प्रत्याशियों को उतारेगी तो न सिर्फ लोगों की नाराजगी दूर होगी बल्कि एंटी इनकम्बेंसी जैसी स्थितियां भी स्वत: खत्म हो जाएंगी।

  कई मंत्रियों की हालात नाजुक केंद्रीय संगठन ने प्रदेश सरकार की परफॉर्मेंस का जो खाका तैयार कराया तो उससे चौंकाने वाले संकेत मिले हैं। इसके अनुसार प्रदेश के अधिकांश मंत्रियों की स्थिति न तो उनके विभाग में संतोषजनक है न उनके विस क्षेत्र में और न ही उनके प्रभार वाले जिले में। रिपोर्ट के अनुसार 17 मंत्रियों की स्थिति काफी चिंताजनक है
जिन मंत्रियों की परफॉर्मेंस संतोषजनक नहीं है उनमें डॉ. गौरीशंकर शेजवार, कुसुम मेहदेले, गौरीशंकर बिसेन, रुस्तम सिहं, ओमप्रकाश धुर्वे, पारसचंद्र जैन, अंतर सिंह आर्य, रामपाल सिंह, माया सिंह, दीपक जोशी, लालसिंह आर्य, शरद जैन, हर्ष सिंह, संजय पाठक, ललिता यादव, विश्वास सारंग, सूर्यप्रकाश मीना का नाम शामिल है।
आरएसएस की चिंता-
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अपने स्वयंसेवकों से 230 विस सीटों की रिपोर्ट मांगी है। संघ प्रमुख मोहन भागवत की अगुवाई में हाल ही में 17 से 21 अप्रैल के बीच पुणे (महाराष्ट्र) में आयोजित बैठक में रिपोर्ट पर मंथन किया गया। संघ के एक वरिष्ठ नेता का मानना है कि यूपी, राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश के उपचुनाव में भाजपा की हार, पंजाब में सत्ता से बाहर हो जाना और मोदी-शाह के गृह राज्य गुजरात में सीटों की संख्या में कमी आना पार्टी के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

 भाजपा अध्यक्ष की टीम का सर्वे-
यदि सूत्रों की बातों पर यकीन किया जाए तो जल्द ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपने स्तर पर मप्र की सभी 230 विधानसभा सीटों पर सर्वे करवा सकते हैं। इस सर्वे का जिम्मा गुजरात की निजी कंपनी को दिया जा सकता है। यह कंपनी विधानसभा के साथ ही लोकसभा के मददेनजर भी सर्वे करेगी। टीम को सर्वे पूरा करने का समय करीब 3 माह दिया गया है। रिर्पोट के आधार पर ही टिकट का वितरण होगा।

 बागियों को साधने बनाया प्लान-
यदि भाजपा नए उम्मीदवारों को मैदान में उतारती है तो चुनाव के दौरान पार्टी के भीतरघात या बागी जैसे हालात न बने, इसके लिए भी पार्टी ने प्लान बी बनाया हुआ है। जिसमें टिकट कटने वालों की नाराजगी दूर करने के लिए सबसे पहला काम ये किया जाएगा कि उनके ही किसी परिजन को टिकट दे दिया जाए अथवा उनकी सहमति से प्रत्याशी चयन किया जाएगा।
 
मंत्री पारस जैन डेंजर झोन में
 हाल ही में हुए सर्वे, न्यूज चैनलों के ओपिनियन पोल को यदि आधार माना जाए तो उज्जैन उत्तर से विधायक होकर करीब 25 वर्षों से भारतीय जनता पार्टी का विधानसभा में नेतृत्व करने वाले पारस चंद्र जैन की हालात काफी नाजुक है। पिछली बार भी कांग्रेस ने इनके सामने दमदार प्रत्याशी नहीं उतारा। पिछले चुनाव में यदि कांगे्रस दमदार प्रत्याशी उतार देती तो पारस पहलवान पटकनी खा चुके होते। इस बार यदि कांग्रेस से माया राजेश त्रिवेदी को टिकिट मिलता है तो पहलवान के मैदान से बाहर नजर आएंगे। यदि भाजपा को अपनी परंपरागत सीट पर कब्जा बरकरार रखना है तो चेहरा बदलना होगा। और कांग्रेस यदि यह सीट हासिल करना चाहती है तो दमदार प्रत्याशी ही मैदान में उतारना होगा।







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